कोरबा में कोयला खदानों और बांगो बांध से विस्थापन का दर्द और भविष्य का संकट
प्रदेश स्तरीय विस्थापन पीड़ितों का महासम्मेलन होगा कोरबा में आयोजित
भू-विस्थापितों के आंदोलन को छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन का मिला समर्थन
Samachar Chhattisgarh Korba.कोरबा। कोयला नगरी के नाम से प्रसिद्ध कोरबा जिला आज गंभीर संकट से गुजर रहा है। कोयला खदानों के लगातार विस्तार, हसदेव जंगल की कटाई और बांगो बांध से हुए विस्थापन ने यहां के हजारों परिवारों की जड़ें हिला दी हैं।
जहां एक तरफ औद्योगिकीकरण और विकास की आड़ में जमीनें अधिग्रहित की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ विस्थापन, आजीविका और पर्यावरणीय असंतुलन का गहराता संकट लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है।
इन्हीं मुद्दों को लेकर अब प्रदेश स्तरीय विस्थापन पीड़ितों का महासम्मेलन कोरबा में आयोजित किया जा रहा है, जिसमें पूरे छत्तीसगढ़ से विस्थापित समुदाय के लोग, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान आंदोलन के नेता शामिल होंगे।
इस आंदोलन को छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन का भी पूर्ण समर्थन प्राप्त हुआ है।
विस्थापन का इतिहास और वर्तमान संकट
1960 के दशक से लेकर आज तक कोरबा जिले में कोयला खदानों के विस्तार ने हजारों परिवारों को उजाड़ दिया है।
कभी हरियाली से भरपूर और खेती योग्य भूमि वाले इस क्षेत्र में आज कोयले की धूल और प्रदूषण का साम्राज्य है।
खनन कंपनियों की मनमानी और प्रशासन की चुप्पी के बीच विस्थापितों के अधिकारों का हनन होता जा रहा है।
भू-अर्जन के नाम पर किसानों की जमीनें छीनी गईं, लेकिन न तो मुआवजा मिला, न रोजगार और न ही पुनर्वास की ठोस व्यवस्था की गई।
कृषि भूमि का विनाश और खाद्य संकट का खतरा
खनन गतिविधियों के कारण अब कोरबा की उपजाऊ कृषि भूमि लगभग नष्ट हो चुकी है।
जहां पहले लोग धान और सब्जी की खेती करते थे, वहां अब खदानों के गड्ढे और राख के ढेर हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस निरंतर विनाश से भविष्य में खाद्य सुरक्षा पर गंभीर संकट मंडरा रहा है।
हसदेव जैसे जंगलों की कटाई से न केवल पर्यावरण असंतुलन बढ़ रहा है बल्कि जलस्तर भी तेजी से गिरा है, जिससे किसानों की शेष खेती भी प्रभावित हो रही है।
रोजगार और खदान बंदी का दोहरा झटका
आज लाखों लोग कोयला उद्योग से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए हैं। लेकिन आने वाले 15-20 वर्षों में जब ये खदानें बंद होंगी, तब इन परिवारों की आजीविका का क्या होगा?
एसईसीएल की नीतियां मनमानीपूर्ण हैं।
कंपनी केवल लाभ कमाने में रुचि रखती है, जबकि प्रभावित परिवारों के भविष्य के लिए कोई ठोस योजना नहीं है।
न खेती बची, न वैकल्पिक रोजगार—ऐसे में कोरबा के युवाओं का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 का उल्लंघन
वक्ताओं ने प्रेस वार्ता में बताया कि भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 का खुलेआम उल्लंघन किया जा रहा है।
कानून की धारा 101 स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि अर्जित भूमि 5 वर्षों तक अनुपयोगी रहती है, तो उसे मूल किसान को वापस किया जाना चाहिए।
लेकिन प्रशासन और कंपनियां इस प्रावधान की अनदेखी कर रही हैं।
इसके विपरीत, किसानों पर दबाव डालकर, डंडे और बंदूक की नोक पर गांव खाली कराने की कार्रवाई की जा रही है।
कई ग्राम ऐसे हैं जहां अर्जन के 30-40 वर्ष बाद भी न तो पुनर्वास स्थल मिला है और न ही स्थायी रोजगार।
छोटे खातेदारों के साथ सबसे बड़ा अन्याय
पहले नियम था कि प्रत्येक खाते पर एक रोजगार दिया जाएगा, लेकिन अब इसे बदलकर “दो एकड़ पर एक रोजगार” का प्रावधान कर दिया गया है।
इस बदलाव से गरीब और छोटे खातेदार पूरी तरह बेरोजगार हो गए हैं।
यह स्थिति इतनी गंभीर है कि एक छोटे खातेदार ने मामला हाईकोर्ट में दायर किया, जहां डबल बेंच ने उसके पक्ष में आदेश दिया कि उसे रोजगार दिया जाए।
इसके बावजूद एसईसीएल ने अदालत के आदेश की अवहेलना की।
अर्जन के बाद नाम से खातेदारों को भी रोजगार से वंचित रखा जा रहा है।
विस्थापन अब अस्तित्व की लड़ाई
अब यह आंदोलन केवल नौकरी या मुआवजे की मांग तक सीमित नहीं रहा।
यह कोरबा के अस्तित्व, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की लड़ाई बन गया है।
छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन के नेताओं का कहना है कि एसईसीएल को अब केवल मुनाफा कमाने वाली कंपनी नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाली संस्था के रूप में काम करना होगा।
विस्थापितों का संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर है —
अब चुप रहने का नहीं, संघर्ष की ज्वाला हर घर तक पहुँचाने का समय है।
प्रदेश स्तरीय महासम्मेलन में तय होगी आंदोलन की दिशा
आने वाले दिनों में कोरबा जिले में प्रदेश स्तरीय विस्थापन पीड़ितों का महासम्मेलन आयोजित किया जाएगा।
इस सम्मेलन में देश के किसान आंदोलन के नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, पर्यावरणविद् और विशेषज्ञ शामिल होंगे।
सम्मेलन में रणनीति बनाई जाएगी कि कैसे विस्थापितों को उनका अधिकार और न्याय दिलाया जा सके।
छत्तीसगढ़ बचाव आंदोलन ने कहा है कि अब यह संघर्ष राज्य स्तर का आंदोलन बनेगा और सरकार को मजबूर किया जाएगा कि वह विस्थापितों के अधिकार, रोजगार और मुआवजे की नीति में पारदर्शिता लाए।
निष्कर्ष
कोरबा का विस्थापन केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि विकास के नाम पर उजाड़े गए लोगों की पीड़ा का प्रतीक है।
अगर यह स्थिति यूं ही बनी रही, तो आने वाले वर्षों में कोरबा न केवल अपनी भूमि और जंगल खो देगा, बल्कि अपनी पहचान भी।
अब समय है कि शासन-प्रशासन संवेदनशील बने और उद्योगों को जवाबदेह ठहराया जाए, ताकि विकास के साथ न्याय भी सुनिश्चित हो सके।



















